गांधीजी का राजनीतिक दर्शन क्या है?(BPSC Mains)

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 गांधीजी का राजनीतिक दर्शन क्या है?(BPSC Mains)



गांधीजी के अनुसार औपनिवेशिक सकता या ब्रिटिश सत्ता के द्वारा भारतीय जनता के मन में दो धाराएं स्थापित की गई थी! इन्हीं पर उनका अर्थ संरक्षण स्वरूप खड़ा था! यह धाराएं थी जिसमें पहली जो शिक्षित भारतीय थे वह विदेशी सार्थक को अपना शुभचिंतक मानते थे !दूसरी जो निरीक्षण थे उनका मानना था कि विदेशी शासक को अंत नहीं किया जा सकता! गांधीजी ने अपने तकनीक द्वारा इस औपनिवेशिक सत्ता के अर्थ संरक्षण वादी स्वरूप को चुनौती दिया! गांधीजी इन के लिए एक लंबे संघर्ष की तैयारी कर रहे थे और औपनिवेशिक सत्ता के राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई नहीं लड़ रहे थे!
 इसके लिए गांधीजी विभिन्न माध्यम से जनता को प्रभावित कर रहे थे !गांधी जी के इस रणनीति को तैयारी संघर्ष तैयारी की रणनीति माना गया है, अर्थात गांधीजी प्रत्यक्ष संग्रह संघर्ष के पश्चात थोड़े काल के लिए अवकाश लेकर आगे की संघर्ष की तैयारी करते थे! इससे इस बात की व्याख्या करने में मदद मिल सकती है कि व्यापक आंदोलन को अनिश्चितकाल या लंबे काल तक नहीं चलाया जा सकता !
गांधीजी के तकनीक में सत्याग्रह एवं अहिंसा को अधिक महत्व दिया गया है! गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में यह स्वीकार किया है कि उनके अभिभावक के दृष्टिकोण एवं उनके रहने के स्थान पर उपस्थित सामाजिक एवं धार्मिक वातावरण को व्यापक रूप से प्रभावित किया उनकी प्रारंभिक विचारधारा को वैष्णव मत और जैन धर्म की परंपराओं ने विशेष तौर पर प्रभावित किया था !गांधीजी के ऊपर श्रीमद् भागवत गीता का भी प्रभाव था! गांधीजी के ऊपर इसके अतिरिक्त ईशा के शेर मन ऑफ द माउंट टॉलस्टॉय ,THERO और ROSKIN के लेखनी में भी उनके चिंतन को प्रभावित किया था! लेकिन इन सबके साथ साथ उनके विचारधारा के विकास और दिशा निर्धारण में सावधिक योगदान उनके जीवन का व्यक्तिगत अनुभव था!

 गांधीजी के विचार धारा का सबसे मुख्य पहलू सत्याग्रह का है जिसका तात्पर्य होता है पवित्र साधे के लिए पवित्र साधन का उपयोग करना इससे गांधी जी ने साधन की पवित्रता पर अधिक बल दिया यही सत्याग्रह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण पहलू बना गांधीजी के अनुसार हिंसा के स्थान पर सत्याग्रह का प्रयोग करने का तात्पर्य स्वयं कष्ट करें !इस प्रकार किया जाना चाहिए कि शत्रु को अपनी बात मनवाने के लिए उनके हृदय को बदला जा सके गांधी जी ने सत्याग्रह और निष्क्रिय प्रतिरोध के बीच अंतर किया !उन्होंने लिखा है कि निष्क्रिय प्रतिरोध एक कमजोर व्यक्ति का अस्त्र है! जिसमें हिंसा और शारीरिक शक्ति का प्रयोग किया जाता है जबकि सत्याग्रह शक्तिशाली व्यक्ति का अर्थ है अस्त्र है क्योंकि इसमें किसी प्रकार की हिंसा का प्रयोग नहीं है वास्तव में गांधीजी के लिए सत्याग्रह मात्र एक राजनीतिक अस्त्र नहीं था बल्कि यह उनके जीवन दर्शन  हिस्सा था!

सत्याग्रह के साधन के रूप में गांधी जी ने अहिंसा को अपनाया इस प्रकार अहिंसा सत्याग्रह का आधार है गांधी जी ने इस बात पर महत्व दिया कि व्यक्ति को अपने राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अहिंसात्मक सत्याग्रह का प्रयोग करना चाहिए किंतु अहिंसा की व्याख्या उन्हें अपने अनुसार किया है! इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि उन्होंने नियंत्रित जन आंदोलन के परिदृश्य में समाज के समस्त वर्गों के हितों को जोड़ दिया गांधीजी के पहले भारतीय राजनीति उदारवादी भिक्षावृत्ति और व्यक्तिगत क्रांति के बीच झूलती रहे जबकि सत्याग्रह की व्यवहारिक राजनीतिक में जमींदार किसान व्यापारी श्रमिक सभी को एक साथ कर दिया क्योंकि इससे कहीं से भी अतिवादी आंदोलन का खतरा नहीं था !यदि तर्क को माना जाए तो यह भी कहा जा सकता है कि अहिंसा की तकनीक राजनीतिक साधनों में अंग्रेज से बराबरी करने का सर्वोत्तम साधन था!
गांधी जी ने टॉलस्टॉय और रस्किन के विचारों को ग्रहण करते हुए सर्वोदय पर बल दीया रोहतक इनका यह विचार है कि "सभी के हित में ही VYAKTI का गीत है"के आधार पर भारत में हुए समन्वय पर बल डालते थे भारत विभिन्न धर्म जाति भाषा के वर्गों का देश है इसीलिए समन्वयक आवश्यक था क्योंकि राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में सभी वर्गों का सहयोग आवश्यक था गांधी जी ने एक तरफ धनी वर्ग के विशेषाधिकार को बने रहने दिया तो दूसरी तरफ निर्धन व्यक्तियों की स्थिति में सुधार के लिए उन्होंने कुछ कार्य किए जैसे खादी ग्राम उद्योग ग्रामीण उद्धार कार्यक्रम इत्यादि अतः उनको सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त हुआ!
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