Wednesday, 1 January 2020

Langik Asamanta Kya Hai लैंगिक असमानता क्या है

Langik Asamanta Kya Hai लैंगिक असमानता क्या है


इस के संदर्भ में भारत जहां एक और आर्थिक राजनीतिक प्रगति की ओर अग्रसर हो रहा है वही देश में आज ही लैंगिक असमानता की स्थिति गंभीर बनी हुई है वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक ने वैश्विक स्तर पर भी लैंगिक असमानता को समाप्त करने में सैकड़ों वर्ष लगने की संभावना व्यक्त की है इन्हीं परिस्थितियों के परिपेक्ष में अमेरिका की राजनीतिज्ञ एलईडी क्विंटल ने कहा है कि महिलाएं संसार में सबसे उपर्युक्त भंडार है

किसी भी समाज की प्रगति का मानक केवल वहां का परिणाम वर्क विकास नहीं होना चाहिए समाज के विकास में प्रतिभाग कर रहे सभी व्यक्तियों के मध्य उस विकास का समावेशन भी होना चाहिए जो जरूरी है इसी परिवेश में नवीन विकास वादियों ने विकास की नवीन परिभाषा में वित्तीय सामाजिक और राजनीतिक समावेशन को आत्मसात किया है 

लैंगिक असमानता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति प्राचीन या वैदिक काल में भी सुदृढ़ थी उस समय महिलाओं को सभा और समिति जैसी सामाजिक संस्थाओं में समान प्रतिनिधित्व मिलता था इसके अलावा अपाला और लोपामुद्रा जैसी महिलाओं ने वेदों की रचना में भी योगदान किया था लेकिन परवर्ती काल में महिलाओं की स्थिति लगातार कमजोर होती गई प्राचीन काल के पश्चात मध्य काल में महिलाओं की स्थिति लगातार खराब बनी रहे ऐसी स्थितियों में आधुनिक काल के कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान लैंगिक असमानता हेतु किए गए प्रयास अत्यधिक प्रशंसनीय रहे तथा इन प्रयासों से महिला समानता की नवीन अवधारणा का उद्भव हुआ एवं स्वतंत्रता के पश्चात निर्मित भारतीय संविधान में भी महिला सशक्तिकरण से संबंधित विभिन्न प्रावधान किए गए है

वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक


 नवीन विश्व में लैंगिक समानता की स्थिति का सबसे प्रखर और प्रगतिशील प्रकाशन विश्व आर्थिक मंच द्वारा वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक के माध्यम से किया जाता है यह सूचकांक में आधुनिक समानता के विभिन्न मुद्दों जैसे अवसर शिक्षा की स्थिति शिक्षा की उपलब्धता स्वास्थ्य की सुरक्षा के साथ ही आर्थिक और राजनीतिक भागीदारी जैसे मानकों का प्रयोग करते हुए 153 देशों में महिलाओं की स्थितियों से संबंधित आंकड़ा का प्रकाशन किया गया है जो हम नीचे दिखाते हैं

वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक के बारे में

  • वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी की जाती है।
  • लैंगिक अंतराल/असमानता का तात्पर्य “लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ भेद-भाव से है। परंपरागत रूप से समाज में महिलाओं को कमज़ोर वर्ग के रूप में देखा जाता रहा है जिससे वे समाज में शोषण, अपमान और भेद-भाव से पीड़ित होती हैं।”
  • वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक निम्नलिखित चार क्षेत्रों में लैंगिक अंतराल का परीक्षण करता है:
  • आर्थिक भागीदारी और अवसर (Economic Participation and Opportunity)
  • शैक्षिक अवसर (Educational Attainment)
  • स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता (Health and Survival)
  • राजनीतिक सशक्तीकरण और भागीदारी (Political Empowerment)
  • यह सूचकांक 0 से 1 के मध्य विस्तारित है।
  • इसमें 0 का अर्थ पूर्ण लिंग असमानता तथा 1 का अर्थ पूर्ण लैंगिक समानता है।
  • पहली बार लैंगिक अंतराल सूचकांक वर्ष 2006 में जारी किया गया था।


वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक 2020


 वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक 2020 में भारत 100 male पर 91 महिला का अनुपात के साथ भारत 112 में स्थान पर रहा है उल्लेखनीय है कि वार्षिक रूप में से जारी होने वाले इस सूचकांक में भारत पिछले 2 वर्षों से 108 में स्थान पर बना रहा था इस सूचकांक के विभिन्न मानकों जैसे स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता के क्षेत्र में भारत को 150 माह आर्थिक भागीदारी और अवसर के क्षेत्र में भारत को 144th स्थान शैक्षिक अवसरों की उपलब्धता के क्षेत्र में भारत को 112th था राजनीतिक सशक्तिकरण और भागीदारी में अन्य बिंदुओं की अपेक्षा बेहतर स्थिति के साथ भारत को 18 स्थान प्राप्त है 

इस सूचकांक में आइसलैंड को सबसे कम लैंगिक भेदभाव करने वाला देश बताया गया है इसके विपरीत यमन 153 th स्थान इराक 152th  पाकिस्तान 151th

भारत में लैंगिक असमानता के कारक 

  • सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक प्रगति के बावजूद भी वर्तमान भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक मानसिकता जटिल रूप से व्याप्त है इसके कारण महिलाओं को आज भी एक जिम्मेदारी समझा जाता है महिलाओं को सामाजिक और परिवारिक दूरियों के कारण विकास के कम अवसर मिलते हैं जिससे उनके व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है सबरीमाला और तीन तलाक जैसे मुद्दों पर सामाजिक मतभेद पितृसत्तात्मक मानसिकता को प्रतिबंधित करता है 
  • भारत में आज भी व्यावहारिक स्तर पर वैधानिक स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश अनुसार संपत्ति पर महिलाओं का समान अधिकार है परंतु पारिवारिक संपत्ति पर महिलाओं का अधिकार प्रचलन में नहीं है इसलिए उनके साथ ही वे अधिकारी व्यवहार किया जाता है 
  • वर्ष 2018 के नवीनतम अधिकारी अधिक श्रम बाल सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं श्रम शक्ति और कार्य सहभागिता दर कम है ऐसी परिस्थितियों में आर्थिक मापदंड पर महिलाओं की आत्मनिर्भरता पुरुष पर बनी हुई है देश के लगभग सभी राज्यों में महिलाओं की कार्य सहभागिता दर में गिरावट देखी है इस गिरावट के विपरीत केवल कुछ राज्य और कुछ केंद्र शासित प्रदेश जैसे मध्य प्रदेश अरुणाचल प्रदेश चंडीगढ़ और दमन और दीव में महिलाओं की सहभागिता दर सुधार हुआ है
  •  महिलाओं में रोजगार अंडररिर्पोटिंग की जाती है महिलाओं द्वारा परिवार के खेतों और उद्यमों पर कार्य करने तथा घरों के भीतर किए गए बने तनिक सकल घरेलू उत्पाद में नहीं जोड़ा जाता है 
  • शैक्षणिक  कारण जैसे मानक पर महिलाओं की स्थिति पुरुषों की अपेक्षा कमजोर है हालांकि लड़कियों के नामांकन में पिछले दो दशकों में वृद्धि हुई है तथा माध्यमिक शिक्षा तक लिंग समानता की स्थिति प्राप्त हो रही हैं लेकिन अभी भी उच्च शिक्षा तथा व्यवसायिक शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं का शैक्षणिक नामांकन पुरुषों की तुलना में काफी कम है

भारत में महिला असमानता को समाप्त करने के लिए प्रयास



  •  समाज की मानसिकता में धीरे-धीरे परिवर्तन आ रहा है जिसके परिणाम स्वरूप महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर गंभीरता से विमर्श किया जा रहा है तीन तलाक हाजी अली जैसे मुद्दों पर सरकार तथा न्यायालय की सक्रियता के कारण महिलाओं को उनका अधिकार प्राप्त दान किया गया था 
  • राजनीतिक प्रतिभाग के क्षेत्र में भारत लगातार अच्छा प्रयास कर रहा है इसी कारण से वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक 2020 के राजनीतिक सशक्तिकरण और भागीदारी मानक पर अन्य बिंदुओं की अपेक्षा भारत को 18 स्थान प्राप्त हुआ है मंत्रिमंडल में महिलाओं की भागीदारी पहले से बढ़कर 10% हो गई है इसमें भारत विश्व का 69 में स्थान पर है
  •  भारत ने मैक्सिको कार्य योजना दर्शी राजनीतिक और लैंगिक समानता तथा विकास और शांति पर संयुक्त राष्ट्र महासभा की शब्दावली के लिए डिक्लेरेशन एंड प्लेटफॉर्म को करने के लिए और करवाया एवं पहले जैसी लैंगिक समानता की वैश्विक की अभी पुष्टि की है
  •  बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ महिला हेल्पलाइन योजना और महिला शक्ति केंद्र जैसी योजनाओं के माध्यम से महिला सशक्तिकरण का प्रयास किया जा रहा है इन योजनाओं के क्रियान्वयन का अनुपात और लड़कियों के प्रगति देखी जा रही है 
  •  आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हेतु मुद्रा और अन्य महिला केंद्रित योजना चलाई जा रही है

निष्कर्ष 


लैंगिक समानता का सिद्धांत भारतीय संविधान की प्रस्तावना मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य और नीति निर्देशक सिद्धांतों में प्रतिपादित है संविधान महिलाओं को न केवल समानता का दर्जा प्रदान करता है अपितु राज्य को महिलाओं के पक्ष में सकारात्मक भेदभाव के उपयोग करने की भी शक्ति प्रदान करता है प्रकृति द्वारा किसी भी प्रकार का लैंगिक विभेद नहीं किया जाता है समाज में प्रचलित कुछ तथ्य जैसे महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा जैविक रूप से कमजोर होती है इत्यादि केवल भ्रांतियां हैं दरअसल महिलाओं में विशिष्ट जैविक अंतर विवेद नहीं बल्कि प्रकृति प्रदत विशेषताएं है जिनमें समाज का भाव और सृजित नहीं था

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