1857 के विद्रोह में कुंवर सिंह की भूमिका

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1857 के विद्रोह में कुंवर सिंह की भूमिका ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारतीयों के परंपरागत संघर्ष की सबसे प्रखर अभिव्यक्ति 18 सो 57 के विद्रोह के रूप में हु इस विद्रोह की शुरुआत देवघर जिले के रोहिणी के सैनिकों के विद्रोह से शुरू हुई इसके बाद या विद्रोह प्रांत के कई हिस्सों में फैल गया बिहार के इस विद्रोह का नेतृत्व करें बाबू कुंवर सिंह को है जाता है 25 जुलाई 1857 को दानापुर छावनी के सैनिकों ने विद्रोह किया और उन्होंने बाबू कुंवर सिंह को अपना नेता मान लिया कुंवर सिंह के नेतृत्व में सैनिकों ने आरा पर अधिकार कर लिया





आरा में सैनिकों का सरकार की स्थापना की गई बिहार में स्थानीय सरकार के गठन का यह पहला उदाहरण था अंग्रेज द्वारा आरा को अपने अधिकार में ले लिया उसके बाद कुंवर सिंह ने अंग्रेजों सासाराम के क्षेत्रों में पुनः शक्ति का पर याद किया उन्होंने उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के निकट विजयवाड़ा में बढ़ाओ डाला और वहां से लखनऊ पहुंचे वीर कुंवर सिंह को अवध के दरबार मैं सम्मान और सहयोग मिला दिसंबर 18 57 में कुंवर सिंह ने नाना साहब के साथ मिलकर आजमगढ़ में अंग्रेजों से युद्ध किया और आजमगढ़ को जीतने में सफलता प्राप्त की उन्होंने गाज़ीपुर को भी जीत लिया बढ़ते ब्रिटिश दबाव एवं विपरीत होती परिस्थितियों में भी जगदीशपुर लौटते समय कैप्टन ली ग्रैंड की फौज को बुरी तरह पराजित किया इसी साल होने के कारण कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई





18 57 के विद्रोह में बाबू कुंवर सिंह की भूमिका के बारे में कहा जा सकता है कि उन्होंने ना केवल बिहार के सैनिकों का विद्रोह किया बल्कि बिहार के बाहर के विद्रोही नेताओं से संपर्क करो में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उन्होंने बिहार के विद्रोह को राष्ट्रीय से जुड़ा से जुड़ा उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के दौरान जिस दूरदर्शिता साहस रण कौशल अखिल भारतीय दृष्टि का परिचय दिया वह निश्चय ही प्रशंसनीय है बाबू वीर कुंवर सिंह जैसे वीरों के कारनामे का ही परिणाम था कि ब्रिटिश शासन की नीतियों के बारे में सोचने और उन्हें बदलने हेतु विवश होना पड़ा बाबू कुंवर सिंह भारतीय राष्ट्रवादी एवं स्वतंत्रता प्रिय व्यक्तियों के लिए तीर प्रेरणा स्रोत बन गए





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