Thursday, 21 February 2019

मृदा अपरदन के मानवीय और सांस्कृतिक कारण

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मानवीय और सांस्कृतिक कारण





1 पशुओं द्वारा अति चारण -





जीन स्थानों पर पशुओं की संख्या अधिक है और चारा का सीमित है वह निरंतर चढ़ाई से दो तरह की हानियां होती है पाली घास आवरण में कमी दूसरी पशुओं के खुर ओं से मिट्टी का कटाव भेड़ बकरी आदि घाट को जड़ से निकाल लेते हैं और पुणे घाट उगने में काफी समय लग जाता है जंगली पशु डालो पर उगने वाले वनस्पति को खा लेते हैं मैदानी तथा पर्वतीय दोनों क्षेत्रों में पशुओं द्वारा अति चराई के कारण मिट्टी का वनस्पति का आवरण नष्ट हो रहा है फलता वर्षा एवं पवन द्वारा अपरदन होता है





2 कृषि की गलत पद्धतिया -





आदमी जनजातियों द्वारा स्थानांतरित कृषि याद झूम कृषि के क्रम में निरंतर वनों को काटा जाता है जिसे मृदा अपरदन का एक प्रमुख कारण है असम, बिहार, तथा मध्य प्रदेश में जनजातीय क्षेत्रों की संख्या 30लाख हेक्टेयर भूमि इसी कृषि पद्धति के अंतर्गत है इसके अतिरिक्त खेतों को चारों ओर मोर बंदी का भाव पर्वतीय क्षेत्रों में ढाल की दिशा में खेती की जुता ई यानी समोच्च रेखाएं के अनुरूप ज्योत का अभाव दोष युक्त फसल चक्र के कारण भी मृदा अपरदन को बल मिलता है





3 वन विनाश -





आधुनिकीकरण के क्रम में वन संपदा के अनियंत्रित दो इमारती लकड़ी फर्नीचर इंधन इत्यादि के लिए वृक्ष को काटने से मृदा अपरदन की समस्या उत्पन्न होती है वनस्पति की जय मृदा संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है विभिन्न क्षेत्रों में पानी की बूंदों का प्रभाव भूमि पति के रूप में होता है और यहां पर अपरदन होता है\





4 जनसँख्या वृद्धि -





भारत में तेजी से बढ़ रही जनसंख्या के कारण वनों को काट कर कृषि भूमि के अंतर्गत आवासीय भूमि के अंतर्गत लाया जाता है इसे भी मिलता क्रिया प्रतीत होती है





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