जवाहरलाल नेहरू की विदेश निति

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जवाहरलाल नेहरू भारत के आजादि के पूर्व लगभग 25 वर्षों से अखिल भारतीय कांग्रेस के विदेशी मामलों के प्रमुख प्रवक्ता रहे तथा आजादी के बाद स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री और 17 वर्षों तक विदेश मंत्री रहे ,इसी कारण उन्हें भारतीय विदेश निति का सूत्रपात कहा जाता है,





नेहरू जी साम्राज्यवाद ,उपनिवेशवाद और फासीवाद के विरोधी थे तथा विश्व शांति के प्रबल समर्थक थे ,उन्हीने अंतराष्ट्रीय राजनीति में पंचशील के सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसके प्रमुख तत्व थे ,अखंडता ,अनाक्रमण ,सहअस्तित्व ,समानता और पारस्परिक लाभ के लिए राष्ट्रों के मध्य सहयोग ,इस सिध्दांत के प्रतिपादन के कारण उन्हें आदर्शवादी कहा जाता था ,किन्तु यह उनकी यथारतवादी कूटनीति चाल थी ,वे चीन के इस सिद्धांत में उलझाए रखना चाहते थे की कोई बड़े संघर्ष को टाला जा सके ,तिब्बत के सवाल पर जो कुछ हुआ वह एक तरह की विवशता थी ,कोई विकल्प शेष नहीं रह गया था ,हिमालय क्षेत्र रणनीति की दृष्टि से उपयुक्त नहीं था ,ब्रिटेन एक सामुद्रिक शक्ति था अतः उसने उत्साहप्रद समर्थन नहीं दिया तथा देश की आंतरिक प्रगति भी धीमी थी ,





गुटनिरपेक्षता यानि असंलता नेहरूजी की बड़ी देन है, इसका तात्पर्य है,अंतराष्ट्रीय सम्मेलनों ,मामलों में एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में समकालीन गुटों से प्रभावित हुए बिना अपनी मौलिक निति के अनुसार भाग लेना ,अन्य राष्ट्रों के उपग्रह के रूप में नहीं ,यह एक सकारात्मक विदेश निति थी जिसका अर्थ था शक्तिमूलक राजनीति से पृथक रहना तथा सभी राष्ट्रों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सक्रिय अंतराष्ट्रीय सहयोग चाहे वे राष्ट्र गुटवध हो या गुटनिरपेक्ष हो ,





भारत चीन युद्ध यह मांग उभरने लगी की असंगलागता निति पूर्णतः असफल हो चुकी है,और दशहत में शीघ्र परित्याग चहिये लेकिन नेहरू जी स्पष्ट कर दिया था की भारत अपनी असंगलागता की निति को अनुसरण करता रहेगा ,युद्ध में स्थिति अत्यंत गंभीर हो जाने पर पश्चिम राष्ट्रों से सैनिक सहायता की अपील की गई ,चीन के बढ़ते अकर्मक कदम रुक गए लेकिन असंगलांगता की निति को छोड़कर अमेरिकी गुट में शामिल हो जाने के फलस्वरूप भारत -चीन सिमा संघर्षशील युद्ध का अंग बन जाता ,नेहरू जी ने वेह्व्हरवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए निर्णय लिया की भारत अपनी रक्षा के लिए सभी राष्ट्रों से सहयता लेगा लेकिन असंगलनगता की निति का परित्याग नहीं करेगा





नेहरू नवस्वतंत्र एफ्रोएशियी राष्ट्रों की एकता के प्रबल समर्थन थे और इस उद्देश्य के लिए उन्होंने 1947 और 1949 में दिल्ली के तथा 1955 में बांडुंग में इन देशों के सम्मलेन में भाग लिया ,इन राष्ट्रों की अस्मिता को सुदृढ़ बनाने ,गुटबंदी और निरंतर शात्रीकरण को होड़ से बचाने के लिए ही नेहरू जी ने गुटनिरपेक्षता का प्रतिपादन किया ताकि ये राष्ट्र अपनी समस्याएं पर ध्यान दें सके और विकास के मुख्य धारा शामिल हो सके ,





नेहरू जी के जीवन काल में ही गोवा के प्रश्न पर भारत ने शक्ति का प्रयोग किया और पुर्तगाली अत्याचारों से गोवा को मुक्ति दिलाई





नेहरूजी के विदेश निति के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया की भारत राष्ट्रमंडल का सदस्य बना रहेगा ,जिस समय नेहरू ने राष्ट्रमंडल में बने रहने का फैसला लिया उस समय उनके सामने अन्य उदेश्यों के साथ यह उद्देश्य भी रहा होगा की इस मंच के द्वारा भारत नवोदित एफ्रोएशिया देशों का नेता बन सकता है, नेहरू जानते थे की भारत का अधिकांश व्यापर ब्रिटेन और राष्ट्रमंडल देशों पर निर्भर है ,तटीय सिमा की रक्षा के लिए भी भारत ब्रिटिश नौसेना पर आश्रित है, तथा भारत का पूरा सैनिक संगठन ब्रिटिश पद्धति पर आधारित है, इस हालत में राष्ट्रमंडल से एका एक सम्बन्ध तोडना कठिनाई थी ,





समग्रतः नेहरू जी की विदेशी निति की तीन विशेषताएं है;-





  1. भारतीय हितों को प्राथमिकता देना है
  2. अंतराष्ट्रीय मामलों में भारत के स्वतंत्र दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करना
  3. विश्व शांति की स्थापना के लिए प्रयत्न करना

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