संपत्ति के अधिकार के वर्तमान रूप आलोचनात्मक मूल्यांकन

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भारतीय परम्परा एवं सांस्कृतिक की अवस्था से ही जनतांत्रिक एवं उदारवादी मूल्यों में रहे है,इसी के अनुरूप भारतीय संविधान में संपत्ति अधिकार मूल अधिकार रूप में शामिल गया ,





संविधान के अनुच्छेद 19 (1 )में प्रत्येक नागरिक को संपत्ति के अर्जन ,धारण और व्ययन का मूल अधिकार दिया गया था ,जिस पर राज्य उसी अनुच्छेद के खंड (5 )के अनुसार साधारण जनता हितों के अथवा अनुसूचित जनजातियों के हितों संगरक्षण के लिए युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है,अनु 31 (1 ) में अनुसार कोई व्यक्ति विधि के प्राधिकार के बिना अपनी संपत्ति से वंचित नहीं किया जायेगा ,31 (2 )के अनुसार राज्य सम्पति का अधिग्रहण केवल सार्वजनिक प्रयोजन के लिए ही करेगा और जिस विधि द्वारा ऐसा अर्जन अथवा अधिग्रहण किया जायेगा वह इसके लिए प्रतिकार का उपबंध करेगा ,





इस प्रकार सामाजिक आर्थिक न्याय बाधक संपत्ति के अधिकार को के श्रेणी से अलग करना आवश्यक माना गया ,इस सम्बन्ध में 44 वीं संविधान संशोधन 1978 द्वारा निम्नलिखित व्यवस्था की गई





अनु ० 19 (1 )च और अनु ० को निरसित कर दिया गया तथा संविधान के भाग 12 में संपत्ति अधिकार शीर्षक से एक नया अध्याय 4 जोड़ा गया जिससे केवल एक अनु ० है 300 (क ),इससे कहा गया की कोई व्यक्ति विधि अधिकार बिना संपत्ति वंचित नहीं कियता जायेगा ,





इस प्रकार वर्तमान में संपत्ति का अधिकार कानूनी अधिकार है, मूल अधिकार नहीं ,अब इसे मूल अधिकार की भाँति संरक्षण प्राप्त नहीं है ,राज्य को विधि के प्राधिकरण से व्यक्तिक सम्प्पति लेने का अधिकार मिल गया है, कार्यपालिका आदेश द्वारा किसी व्यक्ति उसकी सम्पति से वंचित नहीं जा सकता है,





सम्पति अधिकार को कानूनी रूप देने वावजूद समाज आर्थिक न्याय या समाजवाद का उद्देश्य अपेक्षित रूप में किर्यान्वित नहीं हो सका है जिसके कारण -





  1. मूल्य आधारित राजनिति का क्षय सेवा और त्याग की जगह सत्ता और सम्पति पर जोर ,जनकल्याण जगह वोट बैंक की अधिक चिंता
  2. राजनीती में धनपतियों ,सामंतवादी ततवो वर्चस्व
  3. सामाजिक आर्थिक न्याय से सम्बंधित कार्योकर्मो ईमानदार क्रियान्वयन न हो पाना
  4. अशिक्षा और जागरुकता आभाव




इस प्रकार समाजवादी उदेश्यकी प्राप्ति की दिशा में सम्पति का अधिकार को क़ानूनी अधिकार बना देना ही प्रयाप्त नहीं है,इसे यथार्त रूप देने लिए आवश्यक है -





  1. राजनीतिक -प्रशासनिक इच्छासक्ति एवं संवेदनशीलता
  2. पंचवर्षीय योजना में समाजवादी कार्यकर्मो को वरीयता दिया जाय
  3. तमाम विकास कार्यकर्मो का ईमानदार किर्याण्यन हो




वर्तमान वैश्विकरण के युग में बढ़ती विषमता और उससे संघर्षो को उपरोक्त उपायों द्वारा दूर किया जा सकता है और समाजवाद को यथार्त रूप परिणत किया जा सकता है ,आज राष्ट्रीय जीवन में व्याप्त तनावों और असंतोष के मद्देजर समाजवाद लक्ष्य और और अधिक परससंगिक हो गया है,


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