जैन धर्म के बारे में पूरा जाने

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लगभग 2500 वर्ष पूर्व जैन धर्म के 24वे तथा अंतिम तीर्थकर वर्धमान महावीर ने अपने विचारो का प्रसार किया ,वह वज्जि संघ के लिक्च्छवि कुल के क्षत्रिय राजकुमार थे , इस संघ के विषय में हमलोग बचपन से पढ़ते आ रहे है ,महवीर ने 30 वर्ष  आयु में घर छोड़ दिया और  जंगल में  रहने लगे ,12 वर्ष की कठिन तपश्या  के बाद उन्हें  ज्ञान  प्राप्ति हुआ ,उनकी शिक्षा सरल थी,सत्य जानने वाले प्रत्येक स्त्री व् पुरुष को अपना घर छोड़ देना चाहिए उन्हें अहिंशा के नियमो   कड़ाई  से पालन  चाहिए अथार्त किसी को भी   न तो कष्ट  चाहिए   और नहीं किसी  हत्या करनी चाहिए ,महवीर  कहना  था ,'' सभी जीव जीना  चाहते है ,  सभी  के लिए जीवन प्रिय है ''महावीर  शिक्षा प्राकृत भाषा में दी ,देश के  अलग- अलग हिस्सों प्राकृत  अलग -अलग रूप  प्रचलित थे ,प्रचलन क्षेत्र  आधार पर ही उनके अलग -अलग नाम थे,जैसे मगध में बोली जाने वाली प्राकृत भाषा मागधी  कहलाती थी ,





संघ 





महावीर तथा बुद्ध  दोनों का ही मानना था  घर त्याग करने पर ही सच्चे ज्ञान  प्राप्ति हो सकती है ,ऐसे लोगों लिए उन्होंने संघ नामक संगठन बनाया जहाँ घर का त्याग करने वाले लोग  साथ रह सकें ,संघ में प्रवेश लेने वाले स्त्री -पुरुष बहुत सदा जीवन जीते थे ,संघ में प्रवेश लेने वालों में ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,व्यापारी ,मजदूर ,नाइ ,गणिकाएं तथा दास शामिल थे,इनमें से कई लोगो ने बुद्ध  शिक्षाओं के विषय  में लिखा था तथा कुछ लोगों ने संघ में अपने जीवन  विषय  सुन्दर कविताओं की रचना की ,





विहार 





जैन तथा बौद्ध भिक्खु पुरे साल एक स्थान  दूसरे घूमते हुए उपदेश दिया करते थे ,केवल वर्षा ऋतू में जब यात्रा करना कठिन  जाता था तो वे एक स्थान  निवास करते थे ,ऐसे समय वे अपने अनुयायियों द्वारा उद्दानो में बनवाए गए अस्थायी निवासो में अथवा पहाड़ी क्षेत्रो की प्राकृतिक  गुफाओं में रहते थे ,





 





जैन तथा बौद्ध धर्म जिस समय लकप्रिय हो रहे थे लगभग उसी ब्राह्मणो ने आश्रम -व्यवस्था विकास किया ,यहां आश्रम शब्द का तत्प्रय लोगों द्वारा रहने तथा ध्यान करने के लिए प्रयोग में आने वाले स्थान से नहीं है बल्कि इसका तत्प्रय जीवन के एक चरण से है,





ब्रह्मचर्य ,गृहस्थ ,वानप्रस्थ ,क्षत्रिय तथा वैश्य से यह अपेक्षा  जाती थी की इस चरण के दर्जन  दौरान वे सदा जीवन बिताकर वेदों का अध्याय करेंगे ,गृहस्य आश्रम के अंतर्गत उन्हें विवाह कर एक गृहस्य के रूप में रहना होता था ,वानप्रस्थ के अंतर्गत उन्हें जंगल में रहकर साधना करनी थी ,अंततः उन्हें सब कुछ त्याग कर सन्यासी बन जाता था , आश्रम व्यवस्था ने लोगों को अपने जीवन  कुछ हिस्सा ध्यान  लगाने  बल दिया दिया ,


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