वास्कोडिगामा ,कोलंबस ,भरत में यूरोप वाशी

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पन्दहवीं शताब्दी में यूरोपीय नाविकों द्वारा समुद्री मार्ग खोजने के अभूतपूर्व  कार्य किये गए ,उनमे से सबसे सबसे अनेक नाविक भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुंचने का मार्ग खोजने और मसाले प्राप्त करने की इच्छा से प्रेरित थे,





सबसे पहले भारत में आने वाले पुर्तगाली नाविक वास्को-डि-गामा था ,जो हासागर के साथ- साथ यात्रा करते हुए कि ऑफ गुड होप से निकलकर और हिन्द महासागर को पर करके भारत में सबसे पहले कालीकट में पंहुचा ,उसे अपनी पहली यात्रा पूरा करने में एक वर्ष से भी अधिक समय लगा ,वह भारत में 1498  में कालीकट पहुंचा और अगले वर्ष पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन लौट गया ,इस समुद्रीं यात्रा के दौरान चार में से दो जहाज नष्ट हो गए और उसके 170 यात्रियों  में से केवल 54 ही जीवित बचे , खतरों के वावजूद जो मार्ग खोले या खोजे गए वे बहुत ही लाभकारी सिद्ध हुए और उसके बाद तो अंग्रेज ,हालैंडवासी,और फ्रांसीसी नाविकों ने भी उसका अनुकरण प्रारम्भ कर दिया था,





भारत पहुंचने के लिए समुद्री मार्गो की खोजे का बहुत बड़ा सुपरिणाम निकला जिसकी कोई आशा नहीं थी ,उसी समय एक इटली वासी क्रिस्टोफर कोलम्बस ने भारत के खोज के लिए अटलांटिक महासागर को पर करके पश्चिम की और यात्रा करने का निश्चय किया लेकिन उअसक सोचना था की क्योकि पृथ्वी गोल है इसलिए वह पश्चिम की और से भी भारत पंहुचा सकता हैं , वह 1492 में वेस्टइंडीज के तट पर पंहुचा ,वेस्टइंडीज़  नाम इसी भ्रान्ति के कारण पड़ा ,उसके पीछे स्पेन और पुर्तगाल के नाविक और विजेता भी वहां एते रहे उन्हों ने मध्यअमेरिका और दक्षिणी अमेरिका के बड़े -बड़े भागों को अपने कब्जे में कर लिया और अक्सर उन प्रदेश की पहले वाली बस्तियों को नष्ट कर दिया करते थे ,





हम्पी , मसूलीपट्ट्नम और सूरत बारे में एक नजर में 





हम्पी नगर ,कृष्णा और तुंगभंद्रा नदियों की घाटी में स्थित है, इस शहर की स्थापना  1336 में हुआ , उस समय विजयनगर नगर साम्राजय की केंद्र हुआ करता था ,हंपी के शानदार खंडहरों से पता चलता है की उस शहर की किलेबंदी बहुत ही उच्च छोटी की थी ,किले की दीवारों के निर्माण में कहि भी गारे -चुने जैसे किसी भी जोड़ने वाले  मसाले का प्रयोग नहीं  किया गया था और शिला खंडो में को आपस में फंसकर गुंथा गया था , 





सूरत के पश्चिम के प्रवेश द्वार मुगलकाल में कैबे और कुछ समय  बाद के अहमदाबाद के साथ -साथ ,गुजरात के पश्चिमी व्यापार का वाणिज्यिक केंद्र बन गया ,सूरत औरमुज की खाड़ी  होकर पश्चिमी व्यापार करने के लिए मुख्य द्वार था, अंग्रेज इतिहासकार अविंगटन ने 1689 में सूरत बंदरगाहों का वर्णन   करते हुए लिखा है की किसी भी एक वक्त पर भिन्न -भिन्न देशों की औसतन एक सौ जहाज इस बंदरगाह पर लंगर डाले खड़े देखे जा सकते थे,सूरत के वस्त्र अपने सुनहरे गोटा -किनारियों   के लिए प्रसिद्ध थे,उनके लिए पश्चिम एशिया ,अफ्रीका और यूरोप में बाजार उपलबध थे ,1668 में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना मुख्यालय स्थापित कर लिया था , आज सूरत एक महत्वपुर्ण वाणिज्यिक केंद्र है, 





मसूलीपट्ट्नम या मछलीपट्नम नगर कृष्णा नदीं के डेल्टा पर स्थित है ,सत्रहवीं शताब्दी में यह भिन्न -भिन्न  प्रकार की गतिविधियो का नगर था, हॉलैंड और दोनों देशो की ईस्ट इंडिया कंपनियों ने मसूलीपट्नम पर नियंतरण प्राप्त करने का प्रयास किया ,क्योकि तब तक वह आंध्र तट का सबसे महत्वपूर्ण पतन बन गया था ,मसूलीपट्ट्नम का किला ,हालैंडवासी ने बनाया था,





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