ईश्वर के अनुराग,ईश्वर क्या होते है,

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आपने लोगो को पूजा -पाठ करते अथवा भजन कीर्तन या कव्वाली गाते या चुपचाप ईश्वर के नाम का जाप करते हुए देखा होगा ,अपने यह भी गोओर किया होगा की उनमे से कुछ तो भाव - विभोर हो  जाता है की उनकी आँखों में आंसूं भर आते है, 





परमेश्वर का विचार 





बड़े- बड़े राज्यों के उदय होने से पहले ,भिन्न-भिन्न समूहों के लोग अपने -अपने देवी-देवताओं की पूजा करते थे, सभी जीवधारी अच्छे तथा बुरे कर्म करते हुए जीवन मरण और पुनर्जीवन के अनंत चक्रों से गुजरते है, सभी व्यक्ति जन्म के समय भी एक बराबर नहीं होते है मान्यता के अनुसार किसी उच्च परिवार में या उच्च जाती में में पैदा होने के कारण   है ,बहुत सारे लोग ऐसे विचारो से के करन बेचैन रहते थे की वे बुद्ध तथा जैनो के उपदेशो की और उन्मुख हुए जिनके अनुसार व्यक्तिगत प्रयासों से सामाजिक अन्तरो को दूर किया जा सकता है और पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा पाया  सकता है ,श्रीमदभगवतगीता में व्यक्त यह विचार सामान्य की प्रारम्भिक शताब्दी में लोकप्रिय हो गया था ,विष्णु तथा दुर्गा को परम देवी देवताओं को पूजा जाने लगा ,साथ ही साथ भिन्न -भिन्न क्षेत्रो  शिव, विष्णु ,अथवा दुर्गा के रूप में माना  जाने लगा  था , 





दक्षिण भारत में भक्ति का एक नया प्रकार नयनार और अवतार 





कुल मिलाकर 63 नयनार ऐसे थे, जो कुम्हार अस्पृदश्य कामगार  शिकारी ,ब्राह्मण ,सैनिक और मुखिया जैसे अनेक जातियों पैदा हुए थे , उसमे सबसे प्रसिद्ध अप्पार, सम्बन्दर ,सुन्द्ररार और मणिकवसागर थे, तेवरम और तिरुवाचकम ऐसे दो जीतो को संकलन थे, 





12 संख्या अलवार थे, बे लोग भी अलग अलग प्रकार की पृष्ठभूमि  से आये थे , उनमे से सबसे  अधिक प्रसिद्ध पेरिय अलवार ,उनकी पुत्री अंडाल टोंडिप्पोड़ी अलवार और नम्मावार थे, उनके गीत दिव्य परबन्दम में सनकलित है,





भक्त और भगवान 





मणिकवासागर की एक रचना 





मेरे हाड -मांस  के  इस घृणित पुतले में तुम आए ,जैसे यह सोने की मंदिर हो , मेरे प्रभु ,मेरे विशुद्धतम रत्न ,तुमने मुझे सान्तवना देकर बच्चा लिया ,तुमने मेरा दुःख ,मेरा जन्म -मृत्यु  का कष्ट और माया मोह ,हर लिया और मुझे मुक्त  कर दिया, हे बर्ह्मनन्द ,हे प्रकाशमय ,मैंने तुम में शरण ली है,और मै तुम से कभी दूर नहीं हो सकता ,कवि ने भगवान के साथ अपने सम्बन्ध का कैसा वर्णन किया है,





दर्शन और भक्ति 





भारत के सर्वाधिक प्रभावशाली दार्शनिक में से एक शंकर जन्म 8 वीं  शताब्दी में केरल में हुआ था ,रामानुज  का जन्म तमिलनाडु में 11 वीं सदी में हुआ था, वे विष्णुभक्त अलवार के सबसे ज्यादा प्रभवित हुए थे , उनके अनुसार मोक्ष  प्राप्ति  करने वाले व्यक्ति   विष्णु   प्रति अनयन बहुत ही भक्ति भाव  रखना है ,रामानुज  विशिष्टाद्वैत  सिद्धांत के प्रतिपादन किया , इसके अनुसार आत्मा ,परमात्मा  जुड़ने  के बाद भी लोग अपनी अलग सत्ता बनाये रखती है ,रामानुज के सिद्धांत के अनुसार भक्ति की नई धरा को बहुत प्रेरित  किया ,





वीरशैवों के वचन 





धनवान लोग शिव के लिए मंदिर बनाते है,मैं एक गरीब आदमी क्या करूँगा ?मेरी टाँगे खम्भे है , शरीर  तीर्थ मंदिर है ,सिर उसकी छतरी है, सोने की बानी हुई जरा सुनो ,नदी संगम के प्रभु कड़ी हुई चीजें कभी जिर जाएँगी लेकिन चलने वाली सदा चलती रहेंगी ,














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