कबीर ,गुरुनानक , मार्टिन लूथर और आंदोलन

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कबीर  जन्म 15 वीं -16 वीं  सदी में हुए था, वह बहुत ही प्रभावशली  संत थे, उनका पालन पोषण में या उसके पास के एक मुसलमान जुलाहा यानि बुनकर परिवार में हुआ था ,उनके जीवन के बारे में हमारे पास बहुत ही  विश्वसनीय जानकारी प्राप्त है ,हमें उनके विचारों की जानकारी उनकी सखियों और पदों के विशाल संग्रह से मिलती है ,जिनके बारे में यह खा जाता है की इनकी रचना कबीर ने की थी, परन्तु घुमंतू भजन गायक द्वारा गए जाते थे, कुछ भजन गुरु ग्रन्थ साहब पाँचवानी और बीजक में  संग्रहित एवं सुरक्षित है,





सच्चे प्रभु की खोज में,





कबीर की एक रचना ;





अल्लह राम जीऊ तेरे नाई बन्दे ऊपरी मिहर करो मेरे साईं ,क्या लें माटी भुई सुं मरै क्या जल देह नहवाये जो करें मस्कीन सतावे गुण ही रहै छिपाये ,ब्राह्मण वयरसि करै चौबीसें ,काजी महरम जाँन ,ग्यारह मास जुड़े क्यों एकही माहि सामान ,पूर्वी दिशा हरी का बासा पच्छिम अलह मुकामा दिल ही खोजी दिलै भीतरी यहां राम रहिमाना ँ ,





बाबा गुरुनानक एक नजर में ,





कबीर की अपेक्षा बाबा गुरुनानक के बारे में हैं कही अधिक जानते है ,सबसे पहले इनके अवधि के बात करे तो इनके 1469-1539 थी, गुरुनानक का जन्म तलवंडी जो अभी पाकिस्तान ने ननकाना साहब में हुआ  था,बाबा गुरुनानक ने करतारपुर जो रावी नदी के तट पर डेरा बाबा नानक में एक केंद्र स्थापित करने से पहले कई यात्राएं की ,उनके अनुयायी अपने -अपने पहले धर्म या जाती अथवा लिंग -भेद को नजरअंदाज करके एक साझी रसोई में इक्क्ठे खाते-पीते थे, उसे लंगर कहते है,बाबा गुरुनानक ने जहा उपासना और धार्मिक कार्यो के लिए जो जगह नियुक्त की थी उसे संगटी  या धर्मशाला  कहते थे ,





1539 में अपनी  बाद गुरुनानक के अनुयायी को अपना उत्तराधिकार चुना इनका नाम लहना था जो बाद में गुरु अंगद के नाम  जाने लगे ,





मार्टिन लूथर और धर्मसुधार आंदोलन 





16वीं सदी का समय यूरोप  में भी एक धार्मिक अन्तः क्षोभ यानि उथल -पुथल का काल था, तब ईसाई  धर्म में अनेक परिवर्तन हुए ,जिन्हे लाने वाले महत्वपूर्ण नेताओं में से एक मार्टिन लूथर थे, लूथर ने यह महसूस किया की रोमन कैथोलिक चर्च में में अनेक अचार-व्यव्हार बाइबिल की शिक्षयो के विरूद्ध जाते है, लूथर ने लैटिन भाषा में अनुवाद किया और बाईबिल का जर्मन भाषा में अनुवाद किया ,वे दंडमोचन की उस प्रथा का घोर विरोधी था ,


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